Friday, 29 September 2017

september 2017

आपत्ति- प्रत्येक धर्म मज़हब ने अपने-अपने सन्देश वाहक, पैगम्बर या संस्थापक को आखरी कहा है। हद यह है कि अनीश्वरवादी, जैन धर्म व बौद्ध धर्म में भी अपने तीर्थकर व बुद्ध को अन्तिम बताकर आगे के लिऐ तीर्थकरत्व व बौद्ध का दरवाजा बन्द कर दिया।

उत्तर- न केवल यह कि इस्लाम के मूल तत्वों के विषय में आपको अभी और अधिक जानकारी की आवश्यकता है, बल्कि अन्य धर्मों के सम्बन्ध में भी आपकी जानकारी में कमी है। खूब समझ लीजिए कि हज़रत मुहम्मद स0 साहब इस्लाम के संस्थापक हरगिज नही थे। उन्होंने पूरे जीवन में कभी यह दावा नही किया कि वह कोई नया धर्म प्रस्तुत कर रहे हैं। कुरआन ने कभी किसी एक स्थान पर भी यह नहीं कहा कि हजरत मुहम्म स0 के द्वारा ईश्वर किसी नये धर्म की स्थापना कर रहा है। पृथ्वी पर इस्लाम धर्म के पहले पैगम्बर हज़रत आदम अ0 थे जो संसार के पहले इन्सान थे। कुरआन की शिक्षा के अनुसार जब-जब संसार में बिगाड़ पैदा हुए और मानव, इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं से हटे तो ईश्वर ने अपने सन्देशवाहक, मार्ग दर्शन हेतु संसार में भेजे। ईश दूतत्व के इसी क्रम में अन्तिम दूत हज़रत मुहम्मद स0 थे जो किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उसी धर्म को जीवित करने हेतु पधारे थे जिसकी शिक्षाओं को लोगों ने बिगाड़ दिया था। इसी प्रकार हजरत ईसा अ0 भी किसी नये धर्म के संस्थापक नही थे वरन उनसे पूर्व जो बिगाड़ आ गया था उसको सुधारने हेतु पधारे। वर्तमान मत्ती की इन्जील (15ः18ः19) इसकी साक्षी है कि हज़रत ईसा अ0 ने तौरेत के अनुसार, जो उनसे पिछला ग्रन्थ था, आचरण करने का आदेश दिया था। बुद्धमत के अनुसार गौतमबुद्ध पहले बुद्ध न थे अर्थात वह भी बुद्धमत के संस्थापक नही थे। श्री महावीर पहले तीर्थकर नही वरन् उनके अनुसार उनका धर्म वही था जो पहले तीर्थकर ऋषभ देव जी का था और वैदिक धर्म का मामला तो बिल्कुल स्पष्ट है। यद्यपि पहले दूत का नाम वहां गुम हो चुका है परन्तु बाद में आने वाले बहुत से व्यक्तियों को हिन्दु धर्म का स्तम्भ माना जाता है। इस प्रकार पहले तो आप यह शंका दूर कर लें कि हर धर्म ने अपने संस्थापक को अन्तिम संदेशवाहक माना है। (असल में संदेशवाक के लिए संस्थापक शब्द ही गलत है। धर्म का संस्थापक ईश्वर है न कि मानव ईशदूत ईश्वरीय धर्म को स्थापित करने के लिये आते थे)।
अब आईये आपत्ति के दूसरे अंश की ओर और वह यह है कि हर धर्म ने अपने किसी संदेश वाहक को अन्तिम माना है आपका यह दावा भी भ्रम पर आधारित है। सबसे पहले वैदिक धर्म को लें -वेदों ने अपने एक महान दूत क ानाम ‘अग्नि’ बताया था, हम अग्नि को दूत (पैगम्बर) चुनते है।’ (़ऋग्वेद 1ः12ः1) 7 जुलाई 1990 के सहकारी युग में डा0 ऋषि चतुर्वेदी ने इस मंत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अग्नि’ इस मंत्र में किसी मनुष्य को नही बल्कि आग को ही अलंकारिक रूप में दूत कहा गया है। ऐसा नही है, बल्कि ऋग्वेद (1ः31ः15) में साफ साफा अग्नि को ‘नर’ अर्थात ‘मनुष्य’ बताया गया है फिर ऋग्वेद (3ः29ः11) में कहा गया है कि अग्नि का नाम ‘नराशंस’ है। वह ‘नराशंस’ नाम से ही संसार मे आयेगा। शब्द ‘नराशंस’ का अनुवाद ‘प्रशंसा’ योग्य मनुष्य अथवा ‘मोहम्मद’ होता है। फिर अथर्ववेद (20ः127ः1) में साफ साफ कह दिया गया कि नराशंस के आने पर उनकी बहुत प्रशंसा होगी, ऊंट उनकी सवारी होगी, उनकी कई पत्नियां होंगी। फिर उस समय के मक्के की जनसंख्या 60,090 होना, अलंकृत भाषा में हब्शा (इथोपिया) देश में शरण लेने वालों की संख्या 100 होना, 10 जन्नती सत्संगिंयों (अशरा मुबश्शिरा) का संकेत, बंदर के युद्ध में विजयी होकर लौटने वालों की संख्या 300 तथा मक्के की विजय के समय इस्लामी सेना की संख्या 10,000 होने का भी वर्णन किया गया है। वेद मन्त्रों का यह अनुवाद प्राचीन अनुवादकों पण्डित राजाराम और पण्डित खेमखरण के अनुवादों पर आधारित है। वर्तमान में चण्दीगढ़ विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर पण्डित वेद प्रकाश उपाध्याय ने यह सारी व्याख्यायें बहुत स्पष्ट शब्दो में लिखी हैं। श्री ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने हमारे इस अनुवाद को अस्वीकार करते हुए अनुवाद लिखा है वह शब्दो का ऐसा वागजाल है जिसका कोई अर्थ नही निकलता। इस प्रकार आप देखें कि दूत ने अपने अवतरण काल कें बहुत बाद नराशंस नाम के एक दूत के आने की भविष्यवाणी की थी और देव लाने वाले अज्ञात ऋषि को अन्तिम नहीं कहा गया था। गीता (4ः7) और श्रीमद् भागवत महापुराण (9ः24ः56) में यह धारणा अंकित है कि जब जब पृथ्वी पर धर्म में बिगाड़ पैदा हो जाता है तथा दुष्कर्म बढ़ जाते है। तब अवतार संसार में आते हैं (पौराणिक काल के ग्रन्थों में दूत के बजाये अवतार की धारणा है)।

यदूदियों की मौजूदा तौरेत और ईसाईयों की वर्तमान इन्जीलों में भी हज़रत मूसा और हज़रत ईसा को अन्तिम दूत नही कहा गया है। दोनांे में स्पष्ट रूप से बाद  के किसी काल में आने वाले एक दूत को आने के संकेत दिये गये हैं इन्जील में इसको फारक़लीत (च्ंतंबसमजम व िच्मतपबसलजवे) कहा गया है। जिसका अनुवाद है ‘प्रशंसा योग्य’ अथवा ‘मुहम्मद’। तौरेत व इन्जली के उदाहरण आपने विस्तार से मेरी पुस्तक ‘कितने दूर कितने पास’ में देखें होंगे। इसलिये तफसीलात छोड़ रहा हंू। हालंाकि वेदों के दृष्टांत भी उक्त पुस्तक में हैं परन्तु क्योंकि डा0 ऋषि कुमार चतुर्वेदी ने इस पर आपत्तियां की थीं अतः संक्षेप में ऊपर उसका पुनरोल्लेख कर दिया है। गौतम बुद्ध ने भी स्वयं को अन्तिम ‘बुद्ध’ नही कहा था। जब बुद्ध के शिष्य ‘आनन्द’ ने प्रश्न किया, ‘आपके जाने के बाद कौन मार्ग-दर्शन करेगा’ ? बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘मैं पृथ्वी पर आने वाला न तो पहला बुद्ध हंू और न अन्तिम हंूगा। अपने समय में पृथ्वी पर एक पहला बुद्ध आयेगा वह पवित्र, अति बुद्धिमानी होगा। शुभ सृष्टि का ज्ञाता, मानव जाति का अद्वितीय नेता, फरिश्तों और अनितय मनुष्यों का गुरू होगा। मैं ने तुम्हें जो सत्य बातें बताई हैं वह तुम्हें बतायेगा। वह ऐसे धर्म का प्रचार करेगा जिसका प्रारम्भ भी उज्जवल होगा। वह ऐसा धार्मिक जीवन व्यतीत करेगा जो पूर्ण व पवित्र होगा, जैसा कि मेरा ढंग है। उसके शिष्य हजारों होंगे जबकि मेरे सैंकड़ो ही है। आनन्द ने पूछा, ’हम उसे कैसे पहचानें ? बुद्ध ने उत्तर दिया ‘वह मैत्रेय (अर्थात कृपालु) के नाम  जाना जायेगा।
आप विचार करें कि गौतम बुद्ध ने भी अपने आपको अन्तिम नही कहा बल्कि बाद के किसी काल में आने वाले मैत्रेय (कृपालु) की भविष्यवाणी की थी। यह और सुन लें कि कुरआन मंे हज़रत मुहम्मद स0 को ‘रहमतुल्लिल आलमीन’ (सभी संसारों के लिए कृपा सुत्रधार) कहा गया है। पारसियों के दूत जरथुस्त्र के विषय में उनके पवित्र ग्रन्थ ‘अवेस्ता’ में लिखा है कि ईश्वर ने कहा, ‘जैसे जरथुस्त्र के मार्ग पर चल कर उसके अनुयायी वैभव की चोटी पर पहंुचे इसी तरह भविष्य में एक समय में ईश्वर को मानने वाली एक जाति होगी जो संसार और उसके धर्मो को एक नया जीवन प्रदान करेगी और जो दूत की सहायता के लिये खतरनाक युद्धों में खड़ी होगी।’ आगे इस दूत का नाम बताते हुए कहा -‘जिसका नाम विजयी स्वेशियान्ट (ैवमेीरलंदज) होगा और जिसका नाम ‘आस्तवत ईरेटा‘ (।ेजअंज म्तमजं) होगा वह स्वेशियान्ट (कृपा) होगा क्योंकि समस्त संसार को उससे लाभ पहंुचेगा और आस्तवत ईरेटा (जगाने वाला) होगा क्योंकि जीवित मनुष्यों के रूप में वह मनुष्यों को उस विनाश के विरूद्ध खड़ा होगा जो मूर्ति पूजकों और मजदानियों की बुराईयों से फैलेगा। (थ्ंतअंकतपद ल्ंेीजए 25.29ए फनवजमक इल ।ण्भ्ण् टपकीलंतजीप  पद डवींउउंक पद च्ंतेप ैबतपचजनतमे च्रू18 ।) इस्लाम में अन्तिम दूत की धारणा के अतिरिक्त तमाम धर्मों में केवल जैन धर्म के अनुयायी यह धारणा रखते हैं कि श्री महावीर अन्तिम तीर्थकर थे परन्तु वहां भी यह दावा केवल जैनियों का है, स्वयं श्री महावीर के अपने शब्दों में उनके अन्तिम होने का दावा हमें नही मिलता।
इस्लाम संसार का ऐसा एक मात्र धर्म है जिसको पूर्ण करने वाले हज़रत मुहम्मद स0 ने अन्तिम दूत होने की घोषणा की। आप उन्हें ईश्वर का अन्तिम दूत मानें या न मानें, परन्तु यह हरगिज नही कहा जा सकता कि हर संदेशवाहक ने अन्तिम संदेष्टा होने की घोषणा की थी।







Thursday, 31 August 2017

August 2017 pashchimi ujala

अपत्ति- कुरआन में चन्द्रमा पर मानव पदार्पण का और अन्तरिक्ष में खोज की उपलब्धियों का वर्णन नही है।

उत्तर- यह वर्णन भी देख लिजिए- ‘हे जिनों और मनुष्यों की टोलियों! अगर तुम समझते हो कि आकाश और पृथ्वी के व्यासों  संकेत है, गुरूत्वाकर्षण की सीमा की ओर व पृथ्वी व अन्य ग्रहों के गोल होने की ओर भी ) में से गुजर कर पार निकल सकते हो तो ऐसा कर देखा (अतिरिक्त) बल







 
 के प्रयोग के बिना नही कर सकोगे। अब तुम अपने प्रभु के किन-किन वरदानों को झुठलाये जाआगे। (55ः33ः34)। शक्ति तथा वेग के नियमों पर आधारित उपकरणों की सहायता से एक दिन पृथ्वी व अन्य ग्रहों के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र में से गुजरना सम्भव होगा, यह संकेत कुरआन कर चुका था। उस काल मे जो वाहन मौजूद थे उनके अतिरिक्त अन्य वाहनों की खोज होगी, यह भी कुरआन ने बता दिया था ‘अल्लाह ने घोडे़, खच्चर, गधे, तुम्हारे वाहन और शोभा के लिये उत्पन्न किये और वह (इनके अतिरिक्त ऐसे वाहन) उत्पन्न करेगा जिनका तुम्हें अभी ज्ञान नही है’ (16ः8)। इन वाहनों पर सवार होकर चन्द्रमा पर पहुंचने का वर्णन देखिये। ‘पूर्ण हो जाने वाला चन्द्रामा गवाह है कि तुम अवश्य इस धरती से दूसरी धरती तक सवारी पर सवार होकर जाओगे। (यह चमत्कार देख लेने के बाद) फिर इन्हें अब क्या हो गया कि ईमान नही लाते। (84ः18,19,20)। अन्तरिक्ष विज्ञान अनुसंधान ने वर्तमान में जो कुछ सिद्ध किया है तथा जिसका वर्णन 1500 वर्ष पूर्व किसी मनुष्य की जबान से संभव नही था उसे कुरआन की जबान में सुनिये-‘सूर्य चन्द्रमा को अपनी ओर खींच नही सकता और न दिन रात से आगे निकल सकता, यह सब एक कक्षा में अपनी गति के साथ चल रहे हैं।’ (36ः40)। दिन के रात से आगे निकलने के शब्द देखिये, पृथ्वी से उंचाई पर जा कर देखा जाये तो इस दृश्य का इन्हीं शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है कि दोनों एक दूसरे का पीछा कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त आयत में ‘यसबहून’ शब्द है जिसका अर्थ है कि वह अपनी गति के साथ चल रहा है अर्थात आयत में बता दिया गया कि सूर्य चन्द्रमा और पृथ्वी अपने-अपने धुरे पर घूम रहे हैं और इस गति के साथ-साथ अपनी-अपनी कक्षाओं  में भी धूम रहे हैं। बीसवीं शताब्दी में आकर विज्ञान ने बताया कि सूर्य अपने धुरे  पर चक्कर 25 दिन में पूरा करता है और अपनी कक्षा  में 125 मील प्रति सेकेण्ड (7,20,000 कि.मी. प्रति घन्टे) की गति से चलते हुए एक चक्कर 25 करोड़ वर्ष में पूरा करता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध ने हब यह बताया है कि सूर्य व चन्द्रमा की जीवन अवधि एक दिन समाप्त हो जायेगी और यह कि सूर्य कए विशेष दिशा में भी बहा चला जा रहा है। आज विज्ञान ने उस स्थान को निश्चित भी कर दिया जहां सूर्य जाकर समाप्त होगा। उसे सोलर एपेक्स  का नाम दिया गया है और सूर्य उसकी ओर 12 मील प्रति सेकेण्ड की गति से बढ़ रहा है। अब ज़रा बीसवीं शताब्दी के इन अनुसंधानांे को कुरआन की दो आयतों में देखे- ‘क्या तुमने इस पर दृष्टि नही डाली की अल्लाह रात को दिन में और दिन को रात में प्रवेश करता रहता है। सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है। हर एक, एक निश्चित समय काल तक ही चलेगा (और जब अल्लाह ऐसा सर्वशक्तिमान और सर्व ज्ञानी है तो) अल्लाह तुम्हारे सारे कर्मों की जानकारी भी रखता है।’ (31ः29)। इस आयत में एक निश्चित समय तक सूर्य और चन्द्रमा की जीवन अवधि का उल्लेख किया गया है और अब सूर्य के एक विशिष्ट स्थान की ओर खिसकने का वर्णन-’और एक निशानी यह भी है कि सूर्य अपने लक्ष्य की ओर चला जा रहा है। यह एक अथाह ज्ञान वाले (अल्लाह) का निश्चित किया हुआ हिसाब है।’ (36ः38)। यह आकाश गंगा, सौर मण्डल तथा पृथ्वी व आकाश कैसे उत्पन्न हुए इस सम्बन्ध में कुरआन ने संकेत दिया था-’ फिर उसने (ईश्वर) अन्तरिक्ष की ओर ध्यान किया और वह पहले धुंआ  था।’ (41ः14)- ‘क्या इन्कार करने वाले नही देखते कि आकाश और पृथ्वी प्रारम्भ में एक देह थे फिर हमने उन्हें अलग-अलग छिटकाया और हर जीव की उत्पत्ति का आधार पानी को बनाया? क्या अब भी वह ईमान नही लायेंगे।’ (21ः30)। उपरोक्त दोनों आयतें नेब्यूला  और बिग-बैंग सिद्धान्त की ओर संकेत करती है। यह भी विशेष रूप से नोट कर लें कि इन सब आयतों में ईश्वर ने इन्कार करने वालों को ईमान लाने का निर्देश यह कहते हुए दिया कि हमारे इन चमत्कारों को देख कर भी तुम ईमान क्यों नही लाते। चैदह सौ वर्ष पूर्व यदि कोई व्यक्ति अपने सामान्य जीवन में अनुभवों पर आधारित साधारण सी बात कविता के रूप में लोगों के समक्ष प्रस्तुत करता तो उसमें यह चुनौती भी होती कि यह साधारण बातें नही, वरन् ईश्वर का वह महान चमत्कार है जिन्हें देखक तुम्हें ईमान लाना ही चाहिए। ईश्वर ने कुरआने करीम मे फरमाया है-’ आसमानों और जमीनों में जो कुछ है, उसे हमने तुम्हारे अधीन कर दिया है और इस तथ्य में उन लोगों के लिये निशानियां हैं जो चिन्तन करते हैं।’ (45ः13)।

आपके लेख में एक पैराग्राफ है जिसका शीर्षक है-‘ भविष्य वाणी’ उसमें आपने जिन बहुत सी वस्तुओं का कुरआन में भविष्यवाणी के रूप में मौजूद न होने का दावा किया था उनमे से अधिकतर को उपरोक्त कुछ उत्तरों में दर्शाया जा चुका है। पृथ्वी व आकाश के दृश्यों की भविष्यणियों के विषय में दो उदाहरण और देख लें, परन्तु यह भी समझ लें कि शब्द भविष्यवाणी इस अर्थ में है कि कुरआन के अवतरण के समय में मनुष्य इनसे परिचित नही थे वरना यह वास्तविकताएं तो उस समय भी विद्यमान थीं-‘और वही है जिसने दो परस्पर मिले हुए दरिया बहाये। एक का पानी मीठा और खुशगवार है, दूसरे का खारा और कड़वा। इन दोनों के मध्य उसने एक अवरोध  रखा है। एक अवरोध जो उन्हें गडमड होने से रोके हुए है’। (25ः53)-‘उस (अल्लाह ) ने दो समुद्रों/दरियाओं को जारी किया जो परस्पर मिल कर चल रहे हैं और फिर भी उनके मध्य ऐसा अवरोध है कि एक का जल दूसरे पर चढ़ ही नही सकता। तो तुम अपने प्रभु के किस-किस वरदान को झुठलाओगे। उनमें से(लोग) मोती तथा मंूगें निकालेंगे’ (55ः19 से 21) बर्मा से चटगांव तक दो दरियाओं के सैंकड़ो मील तक मिल कर बहने का दृश्य देखा जा सकता है। इस विशाल यात्रा में दोनों का जल बिल्कुल अलग-अलग दिखाई देता है दोनों के मध्य एक धारी चली गई है जिसके एक ओर मीठा तथा दूसरी ओर खारा जल है। अमेरिका की मिसीसपी  और चीन के यांग जे नदियों के समुन्द्र में गिरने के स्थान पर इस दृश्य का दर्शन किया जा सकता है। जबकि एक लम्बी दूरी तक इनका मीठा जल समुन्द्र के खारे जल में मिश्रित नही होता। गंगा व जुमना के संगम पर मीलों तक देखा जा सकता है कि एक ओर नीली और एक ओर पीले जल की धाराएं साथ-साथ चली जा रही हैं और दोनों एक दूसरे के लिये यह भी भविष्यवाणी है कि उनमें से मोतियों और मंूगों का का धन निकाला जायेगा। भारत की सरकार ने अभी इस ओर ध्यान नही दिया है। जब यह धन इन नदियों से निकाला जायेगा तो कुरआन का यह चमत्कार भी लोग देखेंगे। अरब से हजारों मील दूर नदियों और सागर की इन गतियों को भी क्या रेगिस्तान के पिछड़े क्षेत्र का रहने वाला नागरिक अब से चैदह सौ वर्ष पूर्व ब्यान कर सकता था। इसी प्रकार समुन्द्र विज्ञान  के विशेषज्ञों ने बताया कि सारे समुद्रों के परस्पर मिले होने के बावजूद उनके पानी का रंग ही नही, तापमान, धनत्व, नमक की मात्रा और सूक्ष्म जीवन सभी एक दूसरे से इस प्रकार भिन्न हैं मानों उनके बीच कोई अदृश्य दीवार है।


Thursday, 27 July 2017

जुलाई 2017 अंक

जुलाई 2017 अंक

ं आपत्ति- ऐटमबम, हाईड्रोजन बम, आदि चमत्कारपूर्ण आविष्कारों व उपलब्धियों के बारे में, जिन्हें मानव जीवन की व पृथ्वी की काया पलट दी है (वेद, तौरते, इन्जील व कुरआन आदि में) एक भी शब्द नही मिलता, न उनमें हाल ही में हुए भयंकर विश्व युद्धों को कोई संकेत है।


उत्तर- जैसा मैं ने प्रारम्भ में कहा था कि मैं अपने आपको कुरआन पर आप द्वारा दी गई आपत्तियों के उत्तरों तक सीमित रखूंगा क्योंकि आपके लेख का असल निशाना वही है -कुरआन में अगर आप ऐटमबम, हाईड्रोजन बम, हीराशिमा या नागासाकी के नाम से तलाश करेंगे तो निश्चय ही निराशा होगी परन्तु मूल संकेत हर वस्तु के मिलते हैं। जब मान मस्तिष्क की पहुंच उस मुकाम तक भी न हुई थी कि मनुष्य और पशुओं के अतिरिक्त भी किसी चीज के जोडे़ हो सकते हैं, उस समय कुरआन ने यह नियम दिया था कि पेड़ पौधे ही नही बल्कि निर्जीव वस्तुओं में भी जोड़ों की व्यवस्था होती है। -पवित्र है वह जिसने हर वस्तु के जोड़े बनाये, चाहे वह पृथ्वी की वनस्पति में से हो या स्वयं उनके अपने अस्तित्व (अर्थात मानव जाति) में से या उन वस्तुओे में से जिनको यह (अभी तक) जानते ही नही’ (36ः36)। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक कभी किसी ने कल्पना भी नही कि थी कि प्रत्येक निर्जीव दिखने वाली वस्तु के सबसे सूक्षम कण ऐटम में इलैक्ट्रान और प्रोट्राॅन के जोड़े होते हैं। हर ऐटम के अपने अन्दर निरन्तर गति की एक व्यवस्था होती है। इसका भी संकेत कुरआन ने 1400 वर्ष पूर्व दिया था।
‘पर्वतों को देख कर तुम यह समझते हो कि यह ठोस और स्थिर है जबकि (उनके कण तो) बादलों की तरह उड़ते फिर रहे हैं, यह अल्लाह का चमत्कार है कि (कणों की गति के होने पर भी) उसने हर वस्तु को ठोस व स्थिर कर रखा है। जैसे वह उन उस्तुओं की जानकारी रखता है जिनसे तुम अनभिज्ञ हो, इसी प्रकार जो कुछ तुम करते हो उस सबका भी उसे ज्ञान है।’ (27ः88)। परमाणु शक्ति का प्रयोग भी मनुष्य करेगा और उससे कितना भयंकर विनाश होगा इसका संकेत दे दिया गया था।
’उन लोगों ने बड़े-बड़े षडयन्त्र रचे और उनके दांव अल्लाह के नियन्त्रण में हैं। यद्यपि यह प्रयत्न ऐसे थे कि उनके पर्वत भी उलट जायें’ (14ः46)। ‘क्या वे लोग जो बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाते रहते हैं इस बात से निश्चित हो गये हैं कि (उनके इन प्रयासों के फलस्वरूप् उनकी ओर की पृथवी फट जाये) और अल्लाह उन्हें पृथ्वी में समा दे अथवा (उनकी हरकतों के फलस्वरूप) उन पर ऐसी दिशा से प्रकोप आये जिसका उन्हें ज्ञान भी न हो’ (16ः45)। उनके परस्पर युद्ध के फलस्वरूप जिस तरह के विनाश होंगे उनमें धमाकों का वर्णन अब यह किसी भी चीज का प्रतीक्षा नही कर रहे हैं। सिवाये एक भयंकर धमाके के, जो उस वक्त उनको ग्रस्त कर लेगा जब वह लड़ रहे होगे।’ (36ः39)। ऐटमी ताबकारी (रेडियेशन) का धुंआ जब उनको ढक लेता और उससे तड़प-तड़प कर और सिसक-सिसक कर लोग मर रहे होंगे उस समय ही स्थिति का वर्णन ‘तुम उस दिन की प्रतीक्षा करो जिस दिन वायुमण्डल का जाने पहचाने धुंए (ताबकारी-रेडियेशन) से भर जायेगा जो लोगांे पर छा जायेगा। यह बड़ा पीड़ा दायक प्रकोप होगा (फिर लोग प्रार्थना करेंगे कि) हे हमारे रब हमसे इस प्रकोप को दूर कर दीजिए हम ईमान लाते हैं। वह कब सदुपदेश ग्रहण करते हैं। हांलाकि उनके पास ईशदूत आ चुका था फिर ये लोग उससे मुंह मोड़ते रहे और वही कहते रहे कि यह (व्यक्ति) सिखलाया हुआ है, दिवाना है। हम कुछ समय के लिए इस महामारी से हटा लेंगे तो तुम फिर अपनी प्रथम अवस्था पर लौट आओगे।’ (44ः10 से 15)। इन्कार करने वाले आखिर और क्या देखने के बाद आस्था व्यक्त करेंगे ? कुरआन में तो चैदह सौ वर्ष पहले यह भी बता दिया गया था कि इन धमाकों के फलस्वरूप जो विनाश होगा उसके मुजरिम नीली आखों वाले अर्थात पश्चिमी देशों के लोग होंगे जिस दिन शंखनाद होगा। (सूर फूंका जायेगा अर्थात बड़ा भयंकर धमाका होगा), उस दिन जो मुजरिम हमारे समक्ष उपस्थित किये जायेंगे वह नीली आंखो वाले होंगे।’ (20ः102)। दिवाकर साहब, स्वयं निरूपक्ष हो कर विचार कीजिए। क्या यह चैदह सौ वर्ष पूर्व के किसी मनुष्य का कथन है ?




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Tuesday, 13 June 2017

may2017

आपत्ति- भारत और चीन जैसे महान देशों की न किसी किताब का नाम वहां (कुरआन में) दिया गया है और न इन देशों में खुदा के जरिये भेजे गये पैगम्बरों का जिक्र है और इसकी एक वजह है कि मुहम्मद (स0) साहब को जितना मालूम था उन्होंने कह दिया और जितना नही मालूम था उसके बारे में मौन रहे।

उत्तर- भारत मे भेजे गये ईश दूतों और ग्रन्थों का कुरआन पाक में जिक्र है। ईश दूत ह0 नूह (अ0) का वेदों व सनातन धर्म के अन्य मान्य ग्रन्थों में प्रायः (महा जलप्लावन वाले) मनु के नाम से उल्लेख है जबकि भविष्य पुराण में उन का असल नाम ‘न्यूह’ बताया गया हैै। वेदों का कुरआन में ‘आदि ग्रन्थों’ के नाम से उल्लेख है। अगर आप विस्तार से जानने की इच्छा रखते हों तो मेरी लिखी पुस्तक ‘अगर अब भी न जागे तो’ का अध्ययन कर सकते हैं।


आपत्ति- क्या मनुष्य के साथ-साथ खुदा मनुष्य की बनाई हुई भाषा का भी मोहताज हो गया है? ऐसी भाषा का जिसमें प्रायः एक ही शब्द के भिन्न-भिन्न अर्थ लगाये जाते हैं। जिनमें गलत फहमियां होती है जिनमें बहुत सी त्रुटियों होना स्वाभाविक ही नही अनिवार्य भी है, जो नामुकम्मल है, जिसके लेखन व प्रकाशन में आम तौर से गलतियां हो जाती हैं, जिनको सुनकर लिखने में भी गलती होना स्वाभाविक है। फिर यह भी निश्चित है कि सन्देश वाहक या पैगम्बर अपनी भाषा में अपने युग के वातावरण रीति-रिवाज, तत्कालीन सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों व समस्याओं की अपेक्षा से ही समाज व संसार के समक्ष रखेगा जैसा कि कुरआन में वर्णित शरीयत में अन्य विधि व व्यवस्थाओं से स्पष्ट है।

उत्तर- आपके विचार से विपरीत भाषा की इसी सांग्रहिकता मंे ही कुरआन का वह जबरदस्त चमत्कार है जिसे आप अपनी अगली आपत्तियों के उत्तर में देखेंगे। यह कुरआन की भाषा का चमत्कार है कि उसके शब्द हर काल की बुद्धि, विवेक और विज्ञान का साथ देते हैं, और भविष्य में भी देते रहेंगे। यह बात भली भांति समझ लीजिये कि कुरआन विज्ञान, गणित, भुगोल, ज्योतिष या अन्य शास्त्रों की तरह का कोई शास्त्र नही है। यह मूल रूप से मार्ग दर्शन हैं। परन्तु कुरआन के इन्ही सीमित शब्दों में असीमित ज्ञान व आध्यात्म के खजाने छिपे हुए हैं जिनमें से कुछ सामने आ चुके हैं और अन्य रहती दुनिया तक प्रकट होते रहेंगे। अपने इस लेख में आगे आने वाली आपत्तियों में आपने एक विस्तृत सूची प्रस्तुत की है और मालूम किया है आपकी मांग अनुसार सूची से सम्बन्धित वर्णन कुरआन में कहां है। भविष्य में आने वाले समय में इन्कार करने वाले इससे बड़ी सूचियां प्रस्तुत करेंगे जो उन वस्तुओं से सम्बन्धित होंगी जिन्हें आज हक नही जानते। अगर इन सब वस्तुओं के उल्लेख तथा विद्याओं के मूल सिद्धान्तों पर आधारित आप कोई पुस्तक संकलित करना चाहंे तो उसमें इतने कागज की आवश्यकता पडे़गी जिसकी उपलब्धि असम्भव होगी और इतनी मोटी पुस्तक बन जायेगी जिसको पढ़ लेना संसार के किसी भी व्यक्ति के लिये सम्भव न होगा। ईश्वर ने अपना कलाम उन शब्दों में मनुष्यों को दिया कि उन्हीं सीमित शब्दों में हर प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। उदाहरण के लिये कुरआन की जिन आयतों में निहित वैज्ञानिक सिद्धान्तों को मेरे अगले उत्तरों में आप देखेंगे, कुरआन के उन्हीें शब्दों में स्वर्ग-नरक और प्रलय के अर्थ भी निकलते हैं जो न केवल सत्य है वरन् करुआन की खुशखबरियां व चेतावनियों पर आधारित आहवान का मूल उददेश्य हैं। लेकिन उन्हीं शब्दों में संसार में होने वाले धमाकों और पृथ्वी की नैमित्तिक प्रलय का चित्रण और सार्वभौमिक वास्तविकतायंे भी है। रहा प्रश्न इस बात का कि मनुष्य की भाषा में ईश्वर का कलाम रिकार्ड होने से उसमें नक़ल आदि की त्रुटियां होने की आश्ंाका है तो इसके लिये ईश्वर का यह आश्वासन पर्याप्त है। इस अनुस्मृति (त्मउपदकमत) को हमने, हां हमीं ने अवतरित किया है और हम इसकी सुरक्षा करने वाले हैं (15ः9)। और इस दावे को जीता जागता प्रमाण संसार की प्रतियां हैं जिनमें परस्पर एक अक्षर का भी अन्तर नही है। दावे की सत्यता का प्रमाण सामने देखने के पश्चात भी आपत्ति करना कहां तक उचित है।


आपत्ति- कुरआन में बार-बार आसमानों का, सात आसमानों का उल्लेख है पर जमीन या धरती को एकवचन के रूप में कहा गया है और उसकी वजह यह है कि मुहम्मद (स0) साहब को यही ज्ञान था कि बस यह धरती ही कुल संसार और शेष आसमान ही आसमान है।

उत्तर- मैं ने गत एक उत्तर में कहा था कि आपने कुरआन का अध्ययन ध्यान पूर्वक नही किया परन्तु आपकी इस आपत्ति से ऐसा प्रतीत होता है कि सिरे से अध्ययन किया ही नही और सुनी सुनाई आपत्तियां आपने अपने लेख में उद्धरित कर दी हैं कुरआन की पहल आयत आपकी इस आपत्ति का हल्कापन स्पष्ट करती है। हर प्रकार की प्रशंसा का पात्र अल्लाह ही है। जो समस्त संसारांे का रब है (1ः1)। कुरआन में अल्लाह को ‘पूर्वो और पश्चिमों का रब’ (70ः40)। कहा गया है। आपने अपने लेख मे ब्रहमाण्ड के विस्तार का वर्णन किया है। कुरआन इसे इन शब्दों मे बयान करता है। ‘अगर हम उनके लिये ब्रहमाण्ड में कोई द्वार खोले दें और वह उसमें चढ़ते चले जायें तो वह कहेंगे कि हमारी नजरे मदमयी हो गयी हैं बल्कि हम पर जैसे जादू ही कर दिया गया है। (15ः14ः15)। 1400 वर्ष पूर्व क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता थ कि ‘हमने ब्राहमाण्ड को अपने सामथ्र्य से रचा है और हम इसको फैलाते हैं’ (51ः47)। यह दृष्टिकोण तो आईन्सटाईन की सापेक्षतावाद (ज्ीमवतल व ित्मसंजपअपजल) के बाद प्रस्तुत किया गया है और फिर आधुनिक भौतिक विज्ञान और ज्योतिष के प्रयोगों से यह जानकारी हुई कि सृष्टि लगातार फैलती है और आकाश गंगाएं एक दूसरे से दूर होती जा रही हैं आपने एकवचन मे ंप्रयोग होने वाले शब्द ‘अर्ज’ का उल्लेख किया है जिसका अनुवाद ‘जमीन’ है। ‘अर्ज’ कुरआन की भाषा में हर नक्षत्र, हर ग्रह या धरती को नही कहते। केवल उस प्रकार की धरती को कहते कि जहां  जीवन के लक्षण हों। नक्षत्रों को ‘नुजूम’ और ग्रहों को ‘कवाकिब’ कहा गया है और इनका उल्लेख कुरआन मे अनेक स्थानों पर है। कुरआन में इस धरती जैसी सात धरतियों का उल्लेख किया गया है। अल्लाह वह है जिसने सात आसमान बनाये और उन्हीें की तरह (सात) धरतियां भी। इन सब में अल्लाह के आदेश अवतरित होते रहते हैं ताकि तुम जान लो कि प्रत्येक वस्तु अल्लाह के सामथ्र्य से परिसीमित है और यह कि अल्लाह हर वस्तु को अपने ज्ञान से घेरे हुए है। (65ः12)। आधुनिक विज्ञान के पास पर्याप्त संकेत आज इस बात के हैं कि इस जैसी अन्य धरतियां ब्रहमाण्ड में है। जहां जीवन पाया जाता है। इनकी संख्या विज्ञान अभी निश्चित नही कर सका है। खोज जारी है जबकि चैदह सौ वर्ष पूर्व कुरआन ने यहां तक बता दिया था कि ब्रहमाण्ड में न केवल अन्य स्थानों पर भी प्राणी हैं बलिक इस धरती पर रहने वालों की एक न एक दिन उनसे भेंट भी होगी। इस घटना को भी ईश्वर ने अपनी निशानियों में से एक निशानी के रूप में प्रस्तुत किया है। और उस (अल्लाह) की निशानियों में से एक यह है कि उसने आकाशों और पृथ्वी को तो उत्पन्न किया ही, इन दोनों में उसने प्राणी फैला रखे है। और वह इनको जब चाहे एकत्रित करने में समर्थ है। (42ः29)। कुरआन ने डेढ़ हजार वर्ष पूर्व बताया कि ब्रहामाण्ड के रहस्य खुलते चले जायेंगे और उसे भी ईश्वर की एक निशानी के रूप में पेश किया था। शीध्र (वह समय आयेगा जब) हम उनको अपनी निशानियां ब्रहामाण्ड में और स्वयं उनके अपने अस्तित्व में दिखायेंग यहां तक कि उन पर स्पष्ट होकर रहेगा कि यह कुरआन सत्य है। (क्या तुम्हारे लिये) तुम्हारे रब का यह गुण पर्याप्त नही कि वह हर वस्तु का (स्वयं) साक्षी है? (41ः53)





 


Saturday, 29 April 2017

अप्रैल2017 अंक

आपत्ति- कुरआन में स्थान पर हज़रत मुहम्मद स0 को ईश्वर दूत न मानने वाले ............को मार डालने और नष्ट कर दने का अहवान और दूसरों को लड़ाने की खुदा की इच्छा का वर्णन है।


उत्तर- ऐसा प्रतीत होता है आप उन लोगों के प्रचार से प्रभावित हो गये हैं जिन्होंने कुरआन मजीद को या तो पूरा नही पढ़ा है या जान बूझ कर कुछ भागों को अनदेखा किया है। पवित्र कुरआन आपके पास हैं यदि आपने ध्यानपूर्वक उसका अध्ययन किया होता तो इतनी भयानक गलतफहमी नही होती। कुरआन तो अपने अनुयायियों से कहता है कि इन्कार करने वालों से कहा दो........तुम्हारे लिये तुम्हारा धर्म, मेरे लिये मेरा धर्म (109ः6) कुरआन का कथन है कि ..धर्म में जबरदस्ती नही की जा सकती। (2ः256)। इन्सानी जान को अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है। कुरआन नेक बन्दों के गुण बयान करते हुए कहता है कि वह उस जान को जिसे अल्लाह ने आदरणीय ठहराया है, बिना हक के हलाक नही करते और न बलात्कार करते हैं और जो कोई ऐसा करेगा, किये का दण्ड पायेगा। (25ः68)। यही सिद्धान्त विस्तार से एक दूसरे स्थान पर देखिये....जो किसी की हत्या करे, बिना कि उसने किसी की हत्या की हो अथवा पृथ्वी पर उत्पात किया हो, मानो उसने समस्त मानव जाति की हत्या की और जिसने किसी की जान बचाई, मानो उसने सारे मुनष्यों की रक्षा की। इन लोगों के पास हमारे पैगम्बर स्पष्ट आदेश लेकर आये परन्तु इसके बाद भी इसे अधिकतर ऐसे हैं जो पृथ्वी पर सीमाओं का उल्लघंन कर जाते हैं (5ः32)। युद्ध की आज्ञा कुरआन केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही देता है.......जिन (आस्तिकों) के विरूद्ध युद्ध किया जा रहा है। उन्हें (अपने बचाव में) युद्ध की अनुमति दी जाती है क्यांेकि उन पर अत्याचार हुआ है और ईश्वर उनकी सहायता करने में निसन्देह समर्थ है। यह वो लोग है जो निर्दोष अपने घरों से निकाले गये थे। उनका अपराध केवल यह था कि ये अल्लाह को अपना पालनहार कहते थे। (23ः39,40)।  जब आस्तिकों पर आक्रमण हो तो उत्पात को समाप्त करने क ेलिए युद्ध की अनुमति है लेकिन युद्ध के समय भी सीमाओं का उल्लघंन न करने का आदेश हैं जैसे ही अत्याचारी अपने अत्याचार से रूक जायें और उत्पात से रूक जाने का आश्वासन दें तो युद्ध तुरन्त रोक देने का आदेश है। ...जो लोग उनसे युद्ध करते है। उनके ईश मार्ग में युद्ध करो मगर (युद्ध करने में) सीमाओं का उल्लघंन करो। (अर्थात तुम अत्याचार पर न उतर आओ) क्योंकि ईश्वर सीमा उल्लघंन करने वालों को पंसद नही करता। इन अत्याचारियों को जहां पाओ कत्ल करों और जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला है, वहां से उन्हें निकाल बाहर करों क्यांेकि यह उत्पात हत्या से अधिक बुरा है। तुम उनके निरन्तर युद्ध किये आज यहां तक कि उत्पात बाकी न रहे और दीन केवल ईश्वर के लिये हो। परन्तु अगर वह (उत्पात करने और दीन के विषय में तुम पर जबरदस्ती करने से) रूक जाये तो यह जान लो कि दण्ड अत्याचारियों के सिवा किसी और के लिये नही है। (2ः190, 191,193)। युद्ध का आदेश अथवा अनुमति केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में हे। कुरआन मजीद में युद्ध से सम्बन्धित जितनी आयतें हैं उन्हें भ्रम फैलाने वाले लोग सन्दर्भ से काट देते हैं और केवल वह अंश निकालकर सामने रखते है जहां युद्ध से बचने का आदेश है। यदि वह सन्धि की ओर अग्रसर हों तो तुम भी उनकी ओर झुक जाओ और फिर यदि उनका आया तुमसे विश्वासघात करने का भी होगा तो (तुम इस संभावना पर सन्धि से न हटना) ईश्वर तुम्हारे लिये पर्याप्त है (8ः61,62)। और अगर वह तुम्हें छोड़ रहें और तुमसे झगड़ा न करें और तुम्हारी ओर सन्धि का सन्देश भेजें तो ईश्वर ने उन पर (हाथ उठाने का) तुम्हारे लिये कोई मार्ग नही रखा (4ः90)। आप यह कहते हैं कि मानने वालों को मार डालने और नष्ट करने का आदेश है। इसके विपरीत तुमसे यदि (युद्ध के वातावरण) में मुशरिकीन में से कोई व्यक्ति तुमसे शरण की प्रार्थना करे तो उसको शरण दो यहां तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन समझ ले फिर उसके शान्ति के स्थान पर वापिस पहुंचा दो। ऐसा इस कारण से है कि यह लोग (इस्लाम की) वास्तिविकता से अनभिज्ञ हैं (9ः6)। जब तक युद्ध ज़रूरी न हो जाये कुरआन अपने अनुयायियों को संयम रखने को प्रोत्साहित करता है। विरोधी अगर कष्ट भी पहुंचाये तो बदले की अनुमित होते हुए भी धैर्य रखना उचित है। और यदि तुम लोग बदला लेना चाहते हो तो (अधिक से अधिक) उतना ही बदला जो जितना कष्ट तुम्हें दिया गया है लेकिन अगर धैर्य रखो तो यह संयम रखने वालों के प्रति बहुत उचित है (16ः126)। तुम (विरोधियों की यातनाओं पर) संयम रखो और तुम्हारे धैर्य तो ईश्वर की ही देन है और यह लोग जो (तुम्हारे विरोध में) षडयन्त्र रचते हैं उनसे निराश न हो क्योंकि जो लोग परहेजगारी ग्रहण करते हैं और (जो लोगों के साथ) सद्व्यवहार करते है।, ईश्वर उनका मित्र है (16ः127,128)। कुरआन आस्तिकों को आदेश देता है कि न्याय का पक्ष शत्रुओं के मामले में भी हाथ से न छूटे। हे ईमान वालों, अल्लाह के लिये पूर्ण नियमित एवं न्याय के साक्षी बनो और किसी कौम की शत्रुता तुम्हें इस बात पर मजबूर न कर दे कि तुम भी (उसके साथ) अत्याचार करने लगो। न्याय से काम लो क्योंकि यह परहेजगारी के अत्यन्त समीप है और अल्लाह से डरते रहो (5ः8)। कुरआन ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यह लोग जो कुछ (तुम्हारे विषय में) कहते हैं उसे हम खूब जानते है। और तुम उन पर जबरदस्ती करने वाले नही हो। (तुम्हारे कार्य तो यह है कि) जो व्यक्ति हमारे प्रकोप से डरता है उसको कुरआन सुना-सुना कर समझाते रहो। (50ः45)। तुम उपदेश किये जाओ तुम्हारा काम सिर्फ उपदेश देना है। तुम उन पर दरोगा तो नही हो। (88ः21,22)। क्या तुम (इस बात के लिये) लोगों पर जबरदस्ती कर सकते हो कि वह ईमान ले ही आये (10ः99)। (हे ईश दूत) तुम्हारी जिम्मेदारी तो केवल (बात को) पहुंचा देना है और हिसाब लेना हमारी जिम्मेदारी है (13ः40)। बात पहुंचाने के लिये भी नम्रता से बातचीत करने का आदेश दिया गया है। अपने रब से मार्ग की ओर युक्ति से और अच्छे उपदेश से बुलाओं और उनसे सभ्यता से ही तर्क करो (16ः125)। कुरआन की इसी युद्ध व शान्ति सम्बन्धी नीति पर ईशदूत स0 अपने जीवन में पूर्णतया कार्यरत रहे। मक्के से मदीने की दूरी 500 किमी. है लेकिन मक्के से मुशरिकीन (बहुदेव वासियों) से जो तीन युद्ध हुए हैं वह मदीने और उसके आस पास हुए जबकि मक्के के लोगों ने उन पर आक्रमण किया था। मक्के की विजय के अवसर पर उस समय तक मुशरिकीन के सरदार अबूसुफियान के घर शरण लेने वाले हर शत्रु के लिये क्षमा की घोषणा की गयी। जब इस्लामी सैनिक विजेता के रूप में मक्के में प्रवेश कर रहे थे तो सेना के ध्वजारोही ने यह नारा लगाया कि ‘आज रक्तपात का दिन आ गया है’ ईश्दूत स0 का शुभ मुखमण्डल क्रोध से तमतमा उठा। आदेश दिया कि नारा लगाने वाले से ध्वज लेकर चलने का सम्मान छीन लिया जाये और आपने इस्लामी सेना को यह नारा दिया कि ‘आज दया करने का दिन है।’

गत 1400 वर्षीय इतिहास में आज तक इस्लामी बहुसंख्यक देशों में गैर मुस्लिम नागरिक शान्ति से रहते आये हैं। वहां के प्रशासकों ने कभी उनकी गर्दन उड़ाने के आदेश पारित नही किये। दिवाकर साहब, आप भी तो मुस्लिम देशों की यात्रा कर चुके हैं, वहां आपको प्यार मिला या आपकी गर्दन उड़ायी गयी ? डेढ़ हजार साल में संसार के किसी मुस्लिम ज्ञानी या साधारण व्यक्ति को कुरआन में यह उपदेश नही आया कि गैर मुस्लिम की हत्या कर डालो, अब आप उन्हें बताना चाह रहे है कि तुम्हें ईश्वर ने हत्या करने का आदेश दिया है ? कृपया इस ओर ध्यान दें कि आप क्या कह रहे हैं।
कुरआन ने जिन आवश्यक परिस्थितियों में युद्ध की अनुमति दी है मैंने संक्षेप मे आपके समक्ष रख दी है अगर अत्याचार और उत्पात करने वालों से आत्मरक्षा न की जाये तो सम्पूर्ण पृथ्वी अत्याचारियों और आतंकवाद से भर जायेगी। उसकी वकालत आपका जहन करता है तो करे, कुरआन के स्वामी का दृष्टिकोण यह हरगिज नही हो सकता।









Thursday, 30 March 2017

मार्च अंक 2017

                    गवाही          सय्यद अब्दुल्लाह तारिक  


आपत्ति- कुरआन भी कम-ज्यादा इसी (वेद जैसी) श्रेणी में आता है। यह भी नही कहा जा सकता कि यह सम्पूर्ण रूप से मुहम्मद (स0) साहब की रचना है या उसमें जो कुछ है वह मुहम्मद (स0) साहब का यह कहकर कहा हुआ है कि वह खुदा का कलाम है। तत्कालीन अरब में न कागज था न छपाई की व्यवस्था थी। खजूर के पत्तों पर, हड्डियांे पर अथवा झिल्ली के टुकड़ों पर लिखने की प्रथा थी। अतः कुछ तो, बल्कि शायद अधिकतर कुरआन सामग्री इस तरह लिखी गई थी। कुछ जो लोगांे को कन्ठस्थ था उनसे वह सामग्री ली गई खलीफा हज़तर उमर के जमाने में कुरआन की आयातों को संग्रहीत करने की व्यवस्था की गयी। हज़रत अबूबक्र ने यह काम हजरत (जैद) बिन साबित अन्सारी के सुपूर्द किया जो मुहम्मद (स0) साहब के कुछ समकालीन व्यक्तियों के साथ, जिन्हें सहाबा कहा जाता है, इस काम में जुट गये। यह ऐलान किया गया कि जिस किसी को कोई आयत या आयतें मुहम्मद साहब के कहने पर उन्होंने लिखी है वह प्रस्तुत की जायें। यही हुआ भी प्रस्तुति के पक्ष में दो व्यक्तियांे की गवाही ली गई और कुरआन संग्रहीत व पूर्ण किया गया। लोगों की याद्दाश्त पूर्णतया सही हो, यह जरूरी नही है और यही बात गवाही को लेकर है। ऐसे साक्ष्य को अटल व अवाधित मानने को कोई स्वस्थ आधार नही है, क्यांेकि याद्दाश्त बरहाल याददाशत है और गवाही आखिर गवाही है। पूरी सम्भावना यहां इस बात की है कि मुहम्मद (स0) साहब ही नही, उन व्यक्तियों के मन्तव्य भी कुरआन के अन्तर्गत आ गये होंगे जिन्होंने ‘आयते’ प्रस्तुत की थीं। इस तरह कुरआन को भी वेद की तरह एक संग्रहीत ग्रन्थ ही कहा जायेगा अन्तर केवल यह है कि वेद हजारों वर्ष से संग्रहीत हुए और कुरआन कुछ दशब्दियों में ही।

उत्तर- इस सन्दर्भ में आपकी जानकारी में बहुत सी गलतियों का मिश्रण तो है ही, निष्कर्ष निकालने में भी आप निष्पक्ष नही प्रतीत होते।
पहले तो यह संशोधन कर लें कि कुरआन एक ग्रन्थ के रूप में हजरत अबूबक्र रजि0 के शासन काल में संग्रीहत किया गया न कि हज़रत उमर रजि0 के, जैसे कि आपने लिखा है। हज़रत मुहम्मद (स0) साहब के स्वर्गवास के बाद हज़रत अबूबक्र खलीफा चुने गये। वह अपने निधन तक दो वर्षो से कुछ अधिक शासक रहे फिर हज़रत उमर खलीफा हुए। हज़रत उमर के शासन काल मे हज़रत अबूबक्र जीवित ही न थे, उन दोनों का आपसी परामर्श कैसे होता, जैसा कि आपने लिखा है!

अब आईये दुबारा इस वास्तविकता पर कि ईशदूत हज़रत मुहम्मद (स0) साहब के बाद हज़रत अबूबक्र रजि0 नियुक्त हुए और इसके बाद ढाई वर्ष से कम समय संसार में रहे। हजरत उमर रजि0 के परामर्श पर उन्होंने अपने जीवन काल में कुरआन को एक ग्रन्थ के रूप में संग्रहीत करने की व्यवस्था की। द्वितीय शासक हज़तर उमर रजि0 ने इस ग्रन्थ को अपने स्वर्गवास के समय अपनी सुपुत्री व हजरत मुहम्मद (स0) साहब की पत्नी हज़रत हफ़सा र0 के पास रखवा दिया। इस प्रकार कुरआन की प्रथम संकलित और लिखित प्रतिलिपि ईशदूत हज़रत मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के ढाई वर्ष के भीतर सुरक्षित कर ली गयी थी। आप अपनी इस शंका को दूर कर लें कि इसमें कुछ दशब्दियों का समय लगा था।

आपको इस बात का भली-भांति अनुमान होगा कि मुसलमान कुरआन पर आचरण के मामले में कितना ही दिवालिया हो गया हो लेकिन कुरआन व पैगम्बरे-कुरआन से उसकी श्रद्धा इस चरम सीमा तक पहुंची हुई है कि वह उनके किसी प्रकार के अपमान की संभावना को सहन नहीं कर सकता। यह उसे अपने जीवन से भी अधिक प्रिय है। जब 1400 वर्ष पश्चात के अधूरे मुसलमान का यह हाल है तो इस की कल्पना भी नही की जा सकती कि सहाबा (ह0 मुहम्मद स0 के सत्संगी) जान बूझकर कुरआन में अपने कलाम का मिश्रण कर सकते थे। अनजाने में इसकी कितनी गुनजाईश थी, इसका अन्दाजा निम्न से लगायें-

पहले अपनी जानकारी की एक और त्रुटि को सही कर लें। आपने लिखा है कि कुछ या अधिक पुरानी सामग्री विभिन्न चीजों पर लिखी हुई थी और कुछ हिस्से लोगों को कन्ठस्थ थे, जिन्हें एकत्रित करके कुरआन संग्रीहत किया गया। ऐसा नही था, बल्कि तमाम कुरआन हजारो लोगों को कन्ठस्थ था और कुरआन की तमाम सामग्री भी विभिन्न वस्तुओं पर लिखी हुई सहाबा के पास मौजूद थी। ह0 मुहम्मद स0 पर जैसे ही कोई आयत अवतरित होती थी आप उसी समय हस्तलेखियों को बुलाकर लिखवा देते थे फिर उनसे पढ़वाकर सुनते थे ताकि कोई त्रुटि नहीे रह जाये। सहाबा (ह0 मुहम्मद स0 के सहचारी) भी इस भाग को उसी समय कन्ठस्थ कर लेते थे। इस प्रकार लिखित रूप में सम्पूर्ण कुरआन विभिन्न वस्तुओं पर ईशदूत स0 के हस्तलेखियों का लिखा हुआ मौजूद था। बहुत से सहाबा जो कन्ठस्थ करते थे, उसे अपने पास भी लिखकर रख लेते थे। ह0 अबूबक्र र0 ने जब कुरआन एकत्रित किया तो वह तमाम सामग्री एकत्रित की जो हजरत मुहम्मद स0 के हस्तलेखियों ने लिखी थी, दूसरे वह समस्त सामग्री भी एकत्रित की गयी जो सहाबा ने अपने पास लिख रखी थी और तीसरे कुरआन के कंठस्थियों को एकत्रित किया गया। उनमें से भी किसी एक स्रोत पर ही भरोसा नही किया बल्कि सभी कंठस्थ्यिों के सर्वसम्मत होने के पश्चात भी अगर कोई ‘आयत’ लिखे हुऐ रूप में उसी समय प्राप्त नही हुई तो उसकी उस समय तक तलाश की गई जब तक वह आयत किसी सहाबा के पास लिखित रूप में नही मिल गयी। इस प्रकार इन तीनों स्रोतों के आपसी पुष्टि और क्रास चैकिंग (ब्तवे बीमबापदहद्ध से यह प्रमाणित ग्रन्थ संग्रहीत हुआ जो हजरत अबूबक्र रजि0 से द्वितीय खलीफा (शासक) हजरत उमर रजि0 को हस्तान्तरित हुआ और जिसे फिर उन्होंने अपने स्वर्गवास के समय अपनी पुत्री हजरत हफ़सा के पास रखवा दिया था। तृतीय खलीफा हजरत उस्मान रजि0 ने उसकी 6 प्रतिलिपियां तैयार करवा कर विभिन्न स्थानों पर भेज दीं। इस पूरी कार्यवाही के समय ह0 मुहम्मद स0 के हस्तलेखी जिनको ईश्वर के दूत ने कुरआन बोलकर लिखवाया था, उपस्थित रहे। अब आप बतायें कि कौन सी गुंजाइश किसी एक शब्द के रददोबदल की भी बाकी रह जाती है ? क्या इस तिहरी क्रास चैकिंग को जिसमें कोई एक कंठस्थी नही बल्कि बड़ी संख्या में कंठस्थी शामिल थे, और जो ह0 मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के केवल ढाई वर्ष के अन्तराल के अन्दर हुई थी, आप अप्रमाणित कह सकते है ? क्या ऐसे प्रमाण को अटल मानने का कोई स्वस्थ आधार नही है ? अगर है तो फिर आखिर किस चीज को आप गवाही कहते हैं
इसके अतिरिक्त किसी सहाबी (सहचारी) का कलाम कुरआन में शामिल हो जाना तो दूर, स्वयं हजरत मुहम्मद स0 ने अपने शब्दों (जिन्हें हदीस कहते हैं) और कुरआन की वर्णनशैली में इतना स्पष्ट अन्तर है कि अरबी भाषा का साधारण विद्यार्थी भी उसे पहचान सकता है। कुरआन और हदीस की शैली का यह अन्तर इतना स्पष्ट है कि अनुवादों मंे भी पहचाना जा सकता है।

आप लिखते है कि ‘लोगों की याददाश्त पूर्णतया सही हो यह ज़रूरी नही है’। अपनी जानकारी के लिए सुन लें कि स्मरण शक्ति की भी लगातार परीक्षा होती रहती थी और यह परीक्षा आज तक जारी है। प्रतिदिन पांच समय की नमाज़ में कुरआन का कुछ भाग पढ़ना आवश्यक होेता है और वर्ष में एक बार रमज़ान के महीने में हर मस्जिद में एक कंठस्थी तरावीह की नमाज में पूरा कुरआन खत्म करता और दूसरे कंठस्थी उसको सुनते हैं। हजरत मुहम्मद स0 ने अपने स्वर्गवास से पूर्व रमज़ान के महीने में दो बार कुरआन सुनाया। उसी का यह परिणाम है कि आज संसार के हर उस भाग में जहां मुसलमान थोड़ी सी संख्या में आबाद हैं, वहां कुरआन के कंठस्थी मौजूद हैं और तजुर्बा किया जा सकता है कि संसार के दूर-दूर के भागों से विभिन्न कंठस्थियों को यदि एकत्रित करके कुरआन सुना जाये तो कोई अन्तर न होगा। यही हाल कुरआन के हस्तलिखित तथा छपी हुई प्रतियों का है। इस्लामी शासन के तीसरे खलीफा हजरत उसमान रजि0 ने जो हजरतर मुहम्मद स0 के स्वर्गवास के 12 वर्ष बाद खलीफा हुए, उनके विभिन्न देशों में भेजे हुए कुरआन की 6 हस्तलिपियों में से दो प्रतियां ताशकन्द और इस्तम्बोल के संग्राहलयों में आज भी मौजूद हैं। इन प्रतियों और संसार के किसी काल के और किसी क्षेत्र के छपे हुए कुरआन में एक अक्षर का भी अन्तर नही है। कभी अगर कुरआन की छपाई में अत्याधिक सतर्कता के पश्चात भी छपाई की गलती होतीहै तो वह तुरन्त पकड़ ली जाती है क्योंकि संासर के हर क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में कंठस्थी मौजूद हैं। जिनकी संख्या लाखों से भी अधिक है। यही कारण है कि अत्यन्त पक्षपाती कुछ लेखकों को छोड़ कर यूरोपीय इतिहासकारों की अधिक संख्या इस बात को मानती है कि संसार में आज जो कुरआन मौजूद है उसका एक-एक अक्षर वही है जिसके हजरत मुहम्मद स0 ने ईश्वरीय ग्रन्थ होने का दावा किया था।